Wednesday, June 23, 2010

आखिर किसे दोष दिया जाए.

यह सब क्यों लिख रहा हूँ ?? इसलिए क्योंकि अब इन्हें पड़ने वाला एक पाठक आ गया हे।
मेरी शादी को हुए अभी कुछ ही सप्ताह हुए थे। हम पति पत्नी साथ साथ रहने को बड़े उल्लासित थे लेकिन अभी कुछ बाधाये थी। एक बाधा थी की मेरी पत्नी अभी कालेज में पढ़ रही थी और उसके माता पिता परीक्षा से पूर्व मेरे साथ भेजने में उत्सुक नहीं थे। खैर होली के बाद कुछ ऐसा संयोग बना की हमने हम दोनों को खंडवा से सतना की रेलयात्रा के लिए तय्यार पाया। वह बिना आरक्षण वाली यात्रा थी और हमारा समय दरवाजे के पास सूटकेस पर बैठकर कटा। उस समय दुख सूटकेस पर बैठकर जाने का नहीं था बल्कि साथ साथ यात्रा करने का असीम उत्साह था। क्या क्या बातें हुई यह तो अब अच्छी तरह से याद नहीं हे लेकिन सतना में सुनील अवस्थी के पास खाना खाकर हम बस द्वारा खजुराहो के लिए रवाना हो गए। घर पत्नी के लिए सजाया जावे या फिर पत्नी आते ही घर अपने आप सज जाता हे वाली दुविधा मेरे साथ थी। उन दिनों फोन करने के लिए भी घंटो लाइन में खड़े होकर इन्तजार करना पड़ता और औरसो फोन करके आने की सूचना देने वाला काम भी नहीं हो पाया। । हमें पहुँच कर हमने उस उस धुल भरे मकान का दरवाजा खोला और बड़े ही गर्व से जिन्दगी मकान को jisme पिछले दस दिनों से सफाई भी नहीं हुई थी अपनी पत्नी को dikhaayaa ।
बाद में किसी ने आकर मकान मकान साफ़ किया aur hame चाय पिलाई। jindagi कुछ ही देर में लाइन पर आ गई । मातादीन ने खाने के लिए बुलाया और खाने से पहले आमरस पीने को दिया। बगीचे में कुछ आम के पेड़ थे। इन आमो को हमने बड़ी मुश्किल में लोगो की नजरो से बचाया था। यह आमरस पत्नी को इतना अच्छा लगा की अब तो हम सुबह शाम इसे ही खाने जैसा पीने लगे।
कुछ दिनों बाद पत्नी ने बुखार जैसा रहने की शिकायत की। उन दिनों के बुखार में यह बुखार बड़ा ही मामूली लगा और हमने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। कुछ दिनों में अस्पताल जाने की नौबत आ गई। डाक्टर ने कहा की चेचक हे और पडोसी उसे माता का प्रकोप बता रहे थे। खैर हमने उसे चेचक ही माना। जब चेचक के दाने फूलकर पत्नी के कपड़ो से चिपक गए तो उन्हें निकालना बड़ी ही कष्टप्रद प्रक्रिया थी।
निर्णय लिया गया की कपडे न रहे तो चिपकेगा क्या? अब पत्नी केवल चादर ओड़ कर लेटी रहती थी। मैं अपनी दोनों नौकरी कर रहा था।
इस चेचक के लिए किसे दोष दे?
वह तो शायद आज भी आम को ही दोषी ठहरा देगी।
बेचारा आम।
हमने आज भी लेकिन आम खाना नहीं छोड़ा.

Sunday, May 30, 2010

Gir


गिर के बारे में सुना बहुत था लेकिन देखा कभी नहीं था तो जब उरी ने गिर जाने का कार्यक्रम बनाया और मुझे भी आने को कहा तो मैं सहर्ष तय्यार हो गया। यहाँ से गिर जाने का मतलब हे ३६ घंटे की थकाऊ यात्रा??

सुबह पांच बजे घर से निकल कर कटनी पहुंचा तो पता चला की महाकोशल नब्बे मिनट देर से आएँगी। लगा शुरुआत अच्छी नहीं हे। जबलपुर पहुँचते तक सोमनाथ एक्सप्रेस का समय हो गया था तो दो पानी बोतल लिया और अपनी सीट पर जा बैठा। ५ मई का दिन और ४४ डिग्री तापमान में शयनयान की यात्रा। मान कह रहा था की काहे को हामी भर ली स्काइप पर बात कर लेते। रानी और उनकी बिटियाँ इटारसी स्टेशन पर चाय लेकर आई थी। होशंगाबाद स्टेशन पर ओमहरी खाना लेकर आये थे और उनके साथ माताराम भी आई थी। उम्र की वजह से अब उनसे ज्यादा चलते नहीं बनता हे। उनका डर था की शायद में फिर इस बार घर न आऊं क्योंकि पिछली बार जब भोपाल गया था तो इतनी जल्दी में था की होशंगाबाद नहीं गया था इसलिए वह मुझसे मिलने स्टेशन तक आई थी। मैंने उन्हें आश्वस्त किया की वापसी में मैं होशंगाबाद आऊँगा फिर बांधवगढ़ जाऊंगा। ओमहरी खाना लेकर आये थे सो कम से कम एक समस्या तो हल हुई। गुजरात की मेरी यात्राओं का सबसे बड़ा दुःख हे की वहां ट्रेन में सुबह चाय नहीं मिलती और जब मिलती भी हे तो कप इतना छोटा होता हे की वह पांच रूपये की डकैती जैसा लगता हे इसलिए मैं चाय खरीदने से इनकार कर देता हूँ। अखबार मिलना तो और भी दूर की कौड़ी साबित होते हे। अहेमेदाबाद में सुबह मुकेश मिलने आये। दोनों ने स्टेशन पर एक चाय पी कुछ अपने रोने रोये, परिवार की बाते की इतना में गाडी चलने का समय हो गया था। गुजरात का एक नक्शा दे गए थे मुकेश। जिसने बड़ी सहायता की रास्ते में तसल्ली देने में की बस अब इतना ही तो और बचा हे जूनागढ़। स्टेशन से एक टेक्सी की, कुछ आम, तरबूज-खरबूज खरीदे और अगला सफ़र सासन का शुरू। जूनागढ़ से सासन कुल ५५ किलोमीटर हे। यदि बस से जाना चाहे तो यात्रा बुरी नहीं। बस भी लगभग उतना ही समय लेती हे जितना टेक्सी। हमारे आगे आगे एक बस चल रही थी जो की सासन पहुँचने तक हमारे आगे आगे थी बस शहर में ही हम उससे बाजी जीत पाए थे जो की हारे हुए जुआँरी के आखिरी दाव जैसा किस्सा था। गुजरात पर्यटन और वन विभाग सिंह सदन नामक एक होटल चलाते हे जो की शासकीय हे। उसे देखने के बाद मैंने सोचा की बेहतर हे की में बाहर कहीं कोई होटल देखूं । सड़क पार कई होटले हे। मेरी-तलाश होटल अन्नपूर्णा पर जाकर ख़त्म हुई। साफ़ सुथरा छोटा सा ऐ सी लगा हुआ कमरा। जगह छोटी हो या बड़ी सस्ते होटलों में बाथरूम अभी भी साफ़ नहीं होते हे। यहीं हाल अन्नपूर्णा का भी था। मेरे शिकायत करने के बाद मुझे आश्वस्त किया गया की इस साल बरसात में इस शिकायत को दूर कर दिया जावेगा।

रात के ग्यारह बजे उरी और उनके मित्र ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी। कुछ देर उनसे बात हुई और सुबह का कार्यक्रम जानकर उनने विदा ली।

उनके साथ एक गाइड राजकोट से आये थे। बड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे। वन विभाग के स्थानीय कर्मचारियों पर उनका अच्छा प्रभाव था। सुबह हम लोग साथ साथ घूमने गए। एक बब्बर शेर को सड़क पर गाड़ियों के आगे आगे चलते हुए देखा। यह मेरा पहला जंगली बब्बर शेर था जिसकी मेने फोटो खींची। फिर कुछ ही मिनटों बाद वन विभाग के कर्मचारियों ने उसकी वो गत बनाई की मुझे प्रार्थना करनी पड़ी की हे इश्वर अगले जनम में मुझे कम से कम बब्बर शेर तो मत बनाना।

नाश्ते के लिए चयनित किये गए स्थान को देखकर मैं चकित था। यहाँ गाइड महोदय पर्यटक के पैसे के दम पर ड्राइवर और वन विभाग के गाइड का पूरा ध्यान रखते हे। गाइड महोदय ने उरी को कहीं एक रात के लिए ले जाने का कार्यक्रम तय किया था। मुझे देखकर साफ़ साफ़ बता दिया की वहां यह नहीं जा सकते। मैंने भी सोचा की ठीक हे इस बेचारे को क्या पता यह तो अपने धंधे की सोच रहा हे तो इस दाल भात में मैं क्यों मूसरचंद बनू।

मैं दोपहर में और अगली सुबह अकेला घूमने गया। शेर दिखे लेकिन कोई ख़ास नहीं।

अगले दिन दोपहर में उरी वापस आये तो पता चला की सिंह सदन में उनके लिए कमरा नहीं हे। घबराए से मुझे फोन किया। मैंने भरोसा दिलाया की अन्नपूर्णा आ जाओ व्यवस्था हो जायेगी। सिंह सदन से एक तिहाई कीमत में एक ठीक ठाक कमरे की व्यवस्था हो गई। उरी ने बताया की पिछले २४ घंटो में केवल एक चिड़िया का फोटो खींचा हे वह भी कोई विशेष नहीं। जमीन पर सोये। खाना भी कोई ठीक नहीं था। जैसे तैसे खाना खाया। कहीं घूम नहीं पाए और एक दिन बर्बाद करके वापस आ गए। हमने अब उसे छोड़ दिया हे। अब केवल हम लोग ही होंगे। उरी ने जब यह कहा तो मैंने कहा ठीक हे।

गिर में यदि आप स्थानीय भाषा नहीं जानते हे अथवा यदि आपके स्थानीय कर्मचारियों से सम्बन्ध नहीं हे तो आप एक सामान्य पर्यटक की तरह पार्क में घूम कर वापस आ जायेंगे। स्थानीय भाषा अथवा व्यक्ति से सम्बन्ध होने पर आपके लिए सारे द्वार खुल जाते हे। शेरो को खदेड़ कर आपकी जीप के सामने लाया जा सकता हे अथवा आपको पैदल उतारकर शेर दिखाने के लिए जंगल में ले जाया सकता हे। मैं यह सब इसलिए लिख रहां हूँ की मैंने यह सब प्रत्यक्ष में होते देखा हे। पैसा दोनों ही शर्तो में देना पड़ता हे। यह सब काम उन लोगो के लिए रोजमर्रा की बाते हे।

एक बार जब उरी को उतार कर ले जाया गया तो मैं भी उनके साथ गया और जो दिखाया गया उसके लिए मैं सोच रहा था की यहाँ क्या ऐसे फोटोग्राफर आते हे जो की यह देख कर खुश हो जाते हे। मुझे तो उसमे कोई विशेष फोटो नजर नहीं आई किन्तु बाद में देखा की उस समय के फोटो ७०% छोटे कर के लोगो को दिखाए जा रहे थे और लोग उसकी तारीफ़ कर रहे थे। अब डिजिटल का सारा खेल समझ में आ रहा था।

हमने जंगल में पुनः उतरने के लिए मना किया तो हमें ज्यादा अच्छे फोटो मिले।

वापसी में मुकेश जी को पुनः क्रतार्थ किया और शाम को घर वापसी की यात्रा शुरू kee।

गिर का तमाशा देखने दिखाने के लिए एक बार पत्नी को लेकर फिर जाऊंगा और फिर यदि कोई व्यावसायिक बंधन नहीं हुआ तो गिर देखने की फिर कोई इच्छा नहीं.

Saturday, April 3, 2010

भोपाल यात्रा.

शायद यह मेरी सबसे छोटी भोपाल यात्रा थी। कुल चार घंटे भोपाल में बिताए और वापस घर। मेरी ट्रेन यात्रा हमेशा दुखदाई होती हे। उमरिया से अमरकंटक ट्रेन में 2 A/C में यात्रा की। जबलपुर तक यह यात्रा सूअर के बाड़े में सोने समान थी। एक यात्री मेरे पास वाली ही सीट पर खुर्राटे ले रहे थे। यह खुर्राटे इतने जोर के थे की मैंने तुरंत ही परिचालक से मेरी सीट बदलने की सिफारिश की लेकिन दुर्भाग्य से एक भी सीट खाली नहीं थी। पूरी यात्रा में मैं कुल दो घंटे सो पाया। वापसी की यात्रा भी कोई ज्यादा सुखदाई नहीं रही। कुल एक घंटे सो पाया तो जब वापस घर पहुंचा तो वह रात भी कुल दो घंटे और बची थी।
शैलेश के मकान की पूजा के अवसर पर भोपाल जाना हुआ था। सोनवाने से मुलाक़ात हुई, पंकज को धन्यवाद की वह मुझे लेने स्टेशन तक आये। संजय से पता चला की उनके यहाँ पिछली २६ मार्च को चोरी हुई थी जिसमे की लगभग १० लाख की कीमत के कैमरे चोरी हो गए थे।
होशंगाबाद मैं ओमहरी आये थे तो इटारसी में रानी और उनकी बिटिया आई थी। यात्रा का मकसद सिद्ध हुआ यह सबसे बड़ी बात थी।

Thursday, April 1, 2010

Rajasthan

मैं मेरी दोनों यात्राओं को एक साथ लिख रहां हूँ क्योकि यह दोनों यात्राये लगभग एक सी ही थी। फिरोजाबाद आगरा के बाद हम जयपुर पहुंचे। उस समय जयपुर नहीं रुके क्योंकि हमें अगली सुबह दुन्द्लोंद जाना था। दुन्द्लोद में मारवाड़ी घोड़ो की दौड़ हो रही थी जिसे की मुझे फोटोग्राफ करना था। ६ दिन वहां रहे, घोड़ो के कई नामचीन लोगो से मुलाकात हुई। इसके बाद मैं फिर जोधपुर गया और इस बार मेरा मकसद था खीचन जाना। सुनील मुझे पहले एक गाँव में ले गए। वहां जाने के बाद वहां आने का मकसद पता चला। गाँव के चारो और चिंकारा घूम रहे थे। कुछ ही देर में सारे चिंकारे एक जगह इकट्ठे होने लगे। मुझे इससे आगे और क्या चाहिए था। सुनील और उनकी बिटिया लोगो से बात करते रहे और मैं फोटो खींचता रहा। इसके बाद सुनील मुझे खीचन लेकर गए। मैं भी खीचन कई सालो से जाना चाहता था लेकिन कभी संयोग नहीं बन रहा था। खीचन पहुँच कर हम कुर्जा को ढूंढ रहे थे की एक सड़क इनारे मुझे १०० से भी ज्यादा कुर्जा बैठे दिखे। मैं फ़ौरन अपने काम में मशगूल हो गया। आप पैदल कुर्जा से १०० मीटर की दूरी तक जा सकते हे। इतना बहुत था मेरे लिए। फिर हमने देखा की आसमान में ढेर सारे कुर्जा उड़ उड़ कर एक ही दिशा में जा रहे हे तो हम भी उस दिशा में चल दिए। थोड़ी ही देर में हमें चुग्गाघर दिखाई पड़ गया। यहाँ लगभग एक हजार पक्षी दाना चुग रहे थे। मैं अपने काम में मशगूल था और सुनील को किसी ने बुलाया तो वह उससे बात करने उसकी छत पर चले गए। बाद में मुझे भी बुलाया तो मैं भी वहां गया और छत से फोटो खींचने लगा। अचानक मेरे हाथ में एक चाय का ग्लास पकड़ा दिया गया। मैं लोभी दो लोभो के बीच में फंस गया। न चाय पीने का लोभ छोड़ सका और न फोटो खींचने का। दोनों काम साथ साथ चलते रहे। इतनी सारी कुर्जा और इतने पास देखकर मैं हैरत मैं था। कैमरा बताता हे की मैं ९० मिनट तक फोटो खींचता रहा। जब काम ख़त्म हुआ तब चाय पिलाने वाले सज्जन को धन्यवाद दिया और उनसे परिचय हुआ तो पता चला की वह सेवाराम हे जो की यहाँ कुर्जा के संरक्षण पर अकेले काम कर रहे हे। इस समय बिजली के तार के खम्भे हटवाना उनकी पहली प्राथमिकता हे। जैसा की इस देश में होता हे वैसा ही सेवाराम के साथ हुआ की बिजली विभाग ने उन पर बिजली चोरी का आरोप लगा कर एक लम्बा चौड़ा बिल भेज दिया। अब आप लड़ते रहो। मैंने सेवाराम को समझाया की यह सब तो शुरुआत हे यदि आगे भी कुर्जा के लिए काम करते रहोगे तो तुम्हे और भी कई आलसी लोगो से इसी प्रकार सामना करना पडेगा। वहां की समस्या का आसान सा हल हे की बिजली के खुले तार की बजाय केबल डाल दी जावे।
खीचन और जोधपुर के फोटो देखकर के का भी मन हुआ इन जगहों को देखने का। उसे होली पर हाथी को सजाने का त्योंहार जयपुर मैं देखना था तो सोचा की होली पर जयपुर खीचन और जोधपुर हो आया जावे।
जयपुर का हाथी सजाने का त्योंहार प्रबंधन की कमी के कारण फीका रहा। खीचन और जोधपुर फिर से बहुत ही बढ़िया रहे। इस बार हमारे साथ एक जर्मन महिला भी थी। उसे बता दिया गया था की खीचन मैं सोने की कोई व्यवस्था नहीं हे और हम जो मिलेगा उसी में संतुष्ट रहेंगे लेकिन खीचन में सुबह जब कुर्जा आती हे उसे देखने के लिए यह सब तकलीफ गंवारा करनी होगी। दो बिस्तरों में तीन लोग सोये। क्या खुर्राटे मारती थी भाई वह महिला। हम दोनों रात भर नहीं सोये और सुबह उठ कर जब उसने पूंछा की रात को नींद आई तो हमारे मुंह से शब्द नहीं निकला। वह ५ स्टारी महिला सुबह कुर्जा को देखकर इतनी प्रसन्न थी की जिसकी कोई व्याख्या नहीं की जा सकती। घर पहुँचने के बाद उसका इ मेल आया की ऐसे कोई और स्थान पर यदि आप लोग जा रहे हो तो मुझे अवश्य बताना मैं भी साथ चलूंगी। इश्वर जाने भविष्य का।
मैं कुर्जा की फोटो के लिए एक बार और खीचन जाऊंगा लेकिन इस बार कुछ दिनों तक रूकूंगा ताकि दोबारा वापस न जाना पड़े।
कुर्जा को अंग्रेजी में Demoiselle Crane कहते हे।

Wednesday, March 31, 2010

स्वर्गीय अंजना तिवारी

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिख पाया इसके लिए अफ़सोस हे। समस्या समय और रोटी के साधन की हे जिसमे की रोटी के साधन जुटाने की जुगाड़ में समय व्यतीत हो जाता हे फिर बाकी कामो के लिए समय को प्राथमिकता के आधार पर उपयोग करना पड़ता हे। फिरोजाबाद की यात्रा के बाद दो बार राजस्थान हो आया तो वह सब सुनना अभी बाकी हे लेकिन आज तो सिर्फ अंजना के बारे में बात करेंगे।
कल यानी ३० मार्च २०१० की सुबह खबर मिली की अभी अभी एक लड़की को कुच्वाही गाँव में शेर ने मार डाला हे। बड़े अनमने मन से मैं जाने को तय्यार हुआ। अनमने मन से इसलिए की जिस घर में किसी की मौत हो गई हो और वहां हम सिर्फ इसलिए पहुँच जाए की हमें उस घटना की विस्तृत जानकारी हो सके, यह उस मृत व्यक्ति का अपमान हे। कल जितने लोग वहां थे उनमे से कोई भी उस परिवार को सांत्वना व्यक्त नहीं कर रहा था बल्कि हर व्यक्ति जानना चाह रहा था शेर कहाँ था, किधर से आया, लड़की क्या कर रही थी आदि आदि। तमाशबीनो की भीड़ थी। जाने अनजाने हम भी उस भीड़ में शामिल थे।
कुच्वाही गाँव पार्क की सीमा से केवल २-३ किलोमीटर दूर हे। गाँव के आसपास जंगल का नामोंनिशान नहीं हे। घर से लगे हुए खेत हे जिनमे की इस समय गेंहू की फसल पक कर तैयार हे । अंजना के घर से लगा हुआ उनका खेत हे। घर से जिस महुआ के पेड़ के नीचे वह महुआ बीनने गई थी उसकी दूरी २०० मीटर से अधिक नहीं होगी। दुर्भाग्य से जहां वह महुआ बीनने गई थी उससे कुछ मीटर की दूरी पर एक शेर एक बैल को मारकर खा रहा था। अंजना का असमय वहां पहुँच जाना शेर को नागवार गुजरा होगा और अपने स्वयम के हितों की रक्षा में उसने अंजना पर हमला कर दिया।
अंजना उस हमले से कहाँ बचने वाली थी। आनन् फानन में प्राण पखेरू उड़ गए होंगे। उन कुछ मिनटों में क्या क्या उसके दिमाग में आया होगा। अंजना की चीख पुकार भी किसी ने नहीं सुनी। अंततः मैं भी भारी मन से उस घर में अन्दर गया। अंजना की बहन उसके सर को अपनी गोद में रखकर बैठी थी, स्तब्ध और भयभीत। बार - बार अंजना के चेहरे और सिर पर हाथ फेरती। परिवार के बाकी सदस्य चीख चीख कर रो रहे लेकिन उसके मुंह से आवाज भी नहीं निकल रही। वह तो बस एकटक उसकी और निहार रही थी। उसकी स्थिति देख मुझे मेरा दिन याद आया जब मेरे पिता की मृत्यु के समय मेरे भाई बहन मुझसे लग कर रो रहे थे और मैं पत्थर सा स्तब्ध खडा था। मेरी आँखों में आंसू नहीं थे, मेरे सामने भविष्य घूम रहा था, उन कुछ क्षणों में ही मैंने अपने आपको जिम्मेदारियों से लाद लिया था। मैं जानता हूँ की ऐसी स्थिति में क्या होता हे शायद यही सब कुछ अंजना की बहन के साथ हो रहा था। उस दिन घर में क्या क्या हुआ यह सब जानने की कोशिश करूंगा लेकिन कुछ महीनो बाद।
शेर और मनुष्य के बारे में कल से ढेर सारी बाते हो रहीं हे । ढेरो सवाल मन में आ रहे हे और उनका उत्तर जानने के लिए कई लोगो से चर्चा की। मेरे मित्र दिनेश ने जो कहा वह सबसे सटीक उत्तर था।
एक समय था जब गाँव और जंगल सब आपस में एक थे, आज गाँव और जंगल के बीच की दूरी बढ़ गई हे। पहले शेर के द्वारा मवेशी या आदमी को मारना एक प्राक्रतिक विपदा मान ली जाती थी लेकिन अब शेर तुम्हारा और गाँव मेरा वाली स्थिति हो गई हे तो आपस में दुश्मनी बढना स्वभाविक हे। शेर आपका हे तो अपने पास रखो वाला सोच अब बढ़ता जा रहा हे।

Tuesday, December 22, 2009

फिरोजाबाद







पिछले तीन सप्ताह से हम बाहर थे। आगरा, फिरोजाबाद, जयपुर और फिर दुन्दलोद हमारे ठिकाने थे। इन सबके बारे में विस्तार से बताऊंगा पहले फिरोजाबाद की हो जाये। चूड़ियों का शहर चूड़ियों का देश फिरोजाबाद । यदि आप आगरा तक जाते हे तो फिर ४५ किलोमीटर और ही तो जाना हे। यह शहर ही चूड़ियों का हे जहाँ कांच के अलावा कोई और बात नहीं होती।

जब हम फिरोजाबाद पहुंचे तब तक सुबह के १० बज चुके थे और शर की गलियां आबाद हो चुकी थी। चारो चूड़ियाँ थी कोई सर पर ले जा रहा था तो कोई साइकिल पर और कोई हाथठेले पर। गलियों में चूड़ियों के टुकड़े बिखरे पड़े थे।

फैक्ट्री में हमें जाने की अनुमति नहीं मिली अन्यथा पिघले हुए कांच को देखने का अनुभव अलग ही होता। चोरी छुपे जहाँ हम जा सके वह जगह थी जहाँ पर की वह चूड़ी पर हिल का काम करते हे। पहले तो हमें सादर बुलाया और जब मेरा कैमरा चलते देखा तो उन्हें घबराहट हुई और फिर सौ बहाने की मालिक का बार बार फ़ोन आ रहे हे की आपको फोटो न लेने दे मैंने कहा की जिस काम को आप सड़क पर कर रहे हे उसमे क्या डर। आपकी दूकान सड़क पर खुलती हे कोई भी सड़क पर खड़े होकर यह सब देख सकता हे तो घबराने की क्या बात हे। लगता हे चोर की दाढ़ी में तिनके वाला कोई मामला रहा होगा।
फिरोजाबाद शहर में कोई डेढ़ लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से और तीन लाख लोग अप्रत्यक्ष रूप से चूड़ी से अपनी आजीविका कमाते हे।

परिवार में सब को पता था की मैं किस समय कहाँ पर रहूंगा। फिरोजाबाद पहुँच कर के ने अपने लिए चूडिया खरीदने की कोशिश की तो उसके नाप की केवल सादा चूड़ियां ही मिली। रानी ने कंगन चाहे तो फिर सबके लिए कंगन ही ख़रीदे गए। मेरे मामा की ससुराल फिरोजाबाद में हे और वह परिवार चूड़ियों का ही धंधा करता हे लेकिन उनकी सिफारिश भी हमें फैक्ट्री में नहीं ले जा सकी।

फिर कभी किसी बार प्रयास करूंगा फैक्ट्री देखने का।


Thursday, November 26, 2009

पचमढ़ी यात्रा




एक दिन शैलेश दुबे का फ़ोन आया मौसम बड़ा सुहाना हे पचमढ़ी चले! मैं सितम्बर से जाने की सोच रहा था लेकिन संयोग नहीं बन रहा था। सोचा चलो हो आते हे। कैमरा उठाया कुछ कपड़े बैग में रखे और जबलपुर में शैलेश से मिले। ५ घंटे की कार यात्रा ने हमें पचमढ़ी पहुंचा दिया। रास्ते में फोटो खींचने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था लेकिन Combine Harvester ने वर्षों की मुराद पूरी कर दी। Agency कई सालो से फोटो मांग रही थी और उस समय मुझे फुर्सत नहीं होती थी। बढ़िया फोटो मिली और Agency ने भी तुरंत स्वीकार कर ली। रास्ते भर Lantaana की झाड़िया दिखती रही लेकिन उन पर शायद ही कोई तितली बैठी दिखी हो। मैं समझता हूँ की यह pesticides के अधिक उपयोग के कारण हे। पिपरिया पहुँचते पहुँचते जोर की भूख लग आई थी। शैलेश ने ढाबा ढूंढना शुरू किया तो हमारी खोज मटकुली में आकर ख़त्म हुई। घर से बाहर निकलने पर कुछ लोगो मांसाहारी खाने का शौक होता हे शैलेश उनमे से एक हे। खाना खाने बाद जब उन्होंने ढाबे वाले को यह कहा की मुर्गी की जान गई और खाने वाले को मजा नहीं आया ऐसा काम मत किया करो तो उसका जवाब था आप ही हे जिन्हें मजा नहीं आया बाकी तो किसी ने कोई शिकायत नहीं की। क्या करते पैसे दिए और चल दिए।


पचमढ़ी पहुंचे तो ठंडक हो चली थी।


मध्य प्रदेश में पचमढ़ी एक ऐसा स्थान हे जहाँ पर की ९० प्रतिशत से अधिक रहवासी पर्यटन पर निर्भर हे। इस गाँव में अब २०० से ज्यादा जिप्सी हे और ५० से ज्यादा होटल। आदमी तो आदमी अब वहां जानवर भी पर्यटकों की ओर देखने लगे हे। महादेव पर बंदरो ने मेरे कैमरा को खाने का सामान समझा और मुझ पर दौड़ पड़े वह तो गनीमत रही की स्थानीय दुकानदार लड़के दौड़ पड़े वरना मुसीबत हो जाती। महादेव के रास्ते भर बन्दर सड़क किनारे बैठे मिलते हे क्योंकि पर्यटक उन्हें खाने के लिए कुछ न कुछ डालते रहते हे और वह बाद में इसे अधिकार पूर्वक मांगने लगते हे। एक ग़लत आदत जिसका की नुकसान दूसरो को उठाना पड़ता हे।


पचमढ़ी में एक बोर्ड लगा हे जो की पचमढ़ी के होटल association ने लगाया हे। इसे पढकर पचमढ़ी की होटल की व्यवस्था के बारे में पता चलता हे। पर्यटकों को सावधान करता हुआ यह बोर्ड बताता हे की यह समस्या कितनी विकराल हो चली हे। लपका एक बहुत ही प्रचलित शब्द हे आगरा के लिए लेकिन उसकी परिभाषा यहीं पढने को मिली।

पचमढ़ी शीताफल के भाव जगह के अनुसार बदलते हे। महादेव में महंगे तो रास्ते में सस्ते और पचमढ़ी में तो और भी ज्यादा महंगे।

पचमढ़ी में अब सड़क पर चलना मुश्किल होता जा रहा हे। बाज़ार में गाड़ियों की वजह से जगह नहीं बचती। मेरा ख्याल हे की एक समय सीमा के अन्दर पचमढ़ी बाज़ार में गाड़ियों का प्रवेश प्रतिबंधित कर देना चाहिए और कुछ रास्तो पर एकमार्गीय व्यवस्था कर देनी चाहिए। यह सही हे की अब पर्यटक भी पचमढ़ी क्या हे और उसका किस प्रकार भ्रमण हेतु उपयोग किया जावे यह नहीं जानते। सूर्यास्त देखने की होड़ में मची भीड़ को उस जगह की सुन्दरता से कोई वास्ता नहीं था। पचमढ़ी दिन पर दिन गन्दी होती जा रही हे polythene और गुटके के pouch हर जगह पड़े थे। थोड़े बहुत भी नही लेकिन इतने की आसानी से इस समस्या को हल करने का कारण ख़ुद बता रहे थे। लेकिन इस सबके बाद पचमढ़ी में भीड़ से दूर एकांत जगह ढूँढने में कोई परेशानी अब भी नही होती। कई ऐसे स्थान हे जहाँ पर की पर्यटक जाना पसंद नहीं करते या जाते भी हे तो ज्यादा देर नहीं ठहरते।

पचमढ़ी अब भी सुहानी हे। जब भी मौका लगे तब हो आओ.