Friday, July 2, 2010

में इस बात को बहुत पहले से जानता था की एक दिन मुझे इस विषवमन का सामना करना पड़ेंगा और वहीँ हुआ भी।ढेर सारे पुराने सूखे घाव फिर से हरे हो गए। दिमाग फिर उस गुस्से से भर गया। लेकिन यह सब क्षणिक भर की ही बात थी जैसे ही उसने अपना संबोधन बदला वह सारा गुस्सा क्षणिक भर में काफूर हो गया। मुद्दों पर आधारित बातें होने लगी। पहले तो उसने सारी बाते जानने की कोशिश की लेकिन जब मैंने सच बताना शुरू किया तो मुझे कई बातों का जबाब नहीं मिला। मैं वह सारे पुराने पत्र नहीं ढूंढना चाहता जो की मैंने लिखे थे और मेरे पास वापस आ गए थे। मैंने वह सब सहेज कर रख लिए थे क्योंकि एक दिन वह मेरे पक्ष के सबसे गवाह होंगे लेकिन आज मैं उन्हें ढूँढने की जरूरत महसूस नहीं करता। मैं यह तो जानता था की यह लोग झूठ बोलते हे लेकिन कितना झूठ बोलते हे यह अब पता चला। दस हजार रूपये लेकर भाग जाने का मतलब हे सीधे सीधे चोरी का आरोप लगाना। मुझे यह सुनकर बड़ी तसल्ली हुई की चलो सच का एक भाग तो स्वतः सामने आया। विगत कुछ दिनों में मेरी अपने सारे मित्रों से बात हुई और सब इस बात से सहमत थे की हाँ यदि वह मेरे पास आना चाहता हे तो मुझे उसका पूरा पूरा ख्याल रखना चाहिए। के भी इस बात से सहमत हे।

2 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

जन्मदिन की अनन्त शुभकामनाएं सत्येन्द्र जी. मैं इस पोस्ट की तह तक नहीं पहुंच सकी, किस के लिये कह रहे हैं? क्या ये आत्मचिन्तन है?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

समझ में नहीं आया मामला।
………….
दिव्य शक्ति द्वारा उड़ने की कला।
किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?